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Monday, October 05, 2009

हाथ की लकीरें


उसके हाथों की लकीरें
बिल्कुल मेरे हाथ की लकीरों जैसी थी...
जैसे खुदा ने हूबहू एक सी किस्मतें दी हों हमें

पर मेरी किस्मत में उसका हाथ नहीं था
न उसकी किस्मत में मेरा

कहीं लकीरों के हेर फेर में खुदा ने गलती कर दी थी
इसलिए उसके हाथ में मेरे नाम की लकीर नहीं थी
न मेरे हाथ में उसके नाम की

इसलिए एक होते हुए भी
हमारा इश्क जुदा था...हमारे इश्क को जुदा होना था

मगर जिंदगी के एक मोड़ पर
इन्तेजार करता मेरा हमसफ़र मुझे मिल गया

क्या मैं उम्मीद करूँ की उसे भी उसका हमसफ़र मिलेगा?

Friday, September 26, 2008

एक शाम जो ढली नहीं...एक चाँद जो निकला नहीं

"तुम ये चवन्नी हँसी कब से हंसने लगे"
"जब से तुम ठहर ठहर कर बोलने लगी हो"

"पागल हो क्या, मैं तो वैसी ही हूँ, और वैसे ही बोलती हूँ", तुमने कुछ नहीं कहा, बस देखा...हाँ तुम्हारी आँखें अब भी वैसी ही थी। पारदर्शी.
"जेएनयु जा पाते हो क्या? "
"नहीं", छोटा सा जवाब था तुम्हारा। मैंने पूछना चाहा था, जा नहीं पाते या जाते नहीं हो. फ़िर सोचा कि क्या फर्क पड़ जायेगा जवाब सुनकर.
फ़िर भी मन नहीं माना, पूछ ही लिया, "क्यों?"
"अकेले जाने का मन नहीं करता। "
"अरे ये कोई बात हुयी, अकेले क्यों जाओगे, किसी को ले लो न अपने साथ, अमित तो वहीँ ब्रह्मपुत्र में है न, या शिवम् को ले लों" । मैं इतनी आसानी से हार थोड़े मान जाती.
वो हलके से मुस्कुराया, "उनके साथ भी अकेला ही होता हूँ। "

थोडी देर की खामोशी...सन्नाटा...बिल्कुल वक्त के ठहर जाने जैसा। जैसे सब यहीं टूट के बिखर जायेगा, भूचाल आएगा और हम दोनों जमीन में समा जायेंगे।
पर ऐसा सच में थोड़े होता है, भले ही दिल्ली भूकंप के बिल्कुल epicentre पर हो.

"यहाँ क्यों आई अभी? मुझसे मिलने?", तुमने पूछा.
हम पार्थसारथी रॉक पर बैठे थे, पाँव झुलाते हुए...सामने सूरज डूब रहा था, उसको पिछले तीन सालो में कोई फर्क नहीं पड़ा था, हालाँकि हम बहुत दूर चले गए थे एक दूसरे से.
"नहीं", मैंने पश्चिम में देखते हुए कहा था..."अपने आप से मिलने। तुमने मुझे यहीं चारदीवारी में बंद कर दिया है. काफ़ी दिनों से ख़ुद को ढूंढ रही थी, जब कहीं नहीं मिली तो वापस यहीं आ गई. ठीक किया न?"
"बिल्कुल ग़लत किया... वापस जा पाओगी?", फ़िर से सवाल.
"उहूँ", मैंने सर हिलाते हुए कहा, "जाने थोड़े आई हूँ। मैं तो बस देखने आई हूँ. तुमको भी...ये सब मेरे लिए अब अजायबघर हो गया है. वापस आ के देख सकती हूँ, छू सकती हूँ, पर जी नहीं सकती. "
इतनी बातों और इतनी खामोशी के बीच बस एक "हूँ", तुम्हारी तरफ़ से.

चाँद उग गया था, लाल और सुनहरी चांदनी छिटकने लगी थी। "मैंने कभी इतना लाल चाँद नहीं देखा, यहाँ पर ऐसा क्यों होता है.?" तुम्हारे पास जवाब नहीं था या तुम्हारा देने का मन नहीं था, पता नहीं. तुम चुप रहे.लौटने का वक्त हो रहा था...पत्थरों से उतर कर जैसे ही पगडण्डी पर पहुंचे चाँद अचानक बादल में छुप गया, मैंने देखा उसी पेड़ के नीचे दो लोग खिलखिला उठे...शायद लड़की का पैर फिसल गया था और वो गिरने वाली थी.अंधेरे में मैंने तुम्हारा चेहरा नहीं देखा, पर मैं जानती हूँ कि तुमने भी उन्हें पहचान लिया था.
"तुम इन्ही से मिलने आई थी न?" तुमने पुछा..."हाँ " एक शब्द का जवाब.

और हम दोनों ने देखा...उस लड़की को जिसकी बातें कभी रूकती ही नहीं थी, और उस लड़के को जो खिलखिला के हँसता था...वो लड़की जिसे हवा में दुपट्टा उड़ना पसंद था, आलू के पराठे, गुझिया और मामू के ढाबे से हॉस्टल तक रेस लगना पसंद था...और जिसे वो लड़का पसंद था जो खिलखिला के हँसता था।

Tuesday, August 26, 2008

शायद...

उठी ऐसी घटा नभ में
छिपे सब चाँद औ' तारे
उठा तूफ़ान वह नभ में
गए बुझ दीप भी सारे
मगर इस रात में भी लौ लगाये कौन बैठा है ?
अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है?

गगन में गर्व से उठ उठ
गगन में गर्व से घिर घिर
गरज कहती घटाएं हैं
नहीं होगा उजाला फ़िर
मगर चिर ज्योति में निष्ठा जगाये कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है ?

प्रलय की रात को सोचे
प्रणय की बात क्या कोई
मगर पड़ प्रेम बंधन में
समझ किसने नहीं खोयी
किसी के पंथ में पलकें बिछाये कौन बैठा है?
अँधेरी रातमे दीपक जलाये कौन बैठा है ?

हरिवंश राय बच्चन की ये पंक्तियाँ, कहीं मर्म को छूती हैं, खास तौर से अन्तिम पंक्तियाँ मुझे बहुत ही ज्यादा पसंद हैं। प्रलय की रात और प्रणय की बात एक ही साथ कहना कोई genius ही कर सकता है।
प्रणय, प्यार, अनुराग, स्नेह, प्यार भी बस एक चीज़ नहीं होता...
किसी को चाहना बस चाहने भर के लिए...सिर्फ़ वक्त के होने भर से...ये भी नहीं की उसे यादों में हर पल संजो के रख दिया जाए...वो तो ममी बन जाता है। प्यार...अमूर्त, सजीव, एक एहसास वो वक्त की गणना में नहीं आता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की मैंने किसी से कितने समय के लिए प्यार किया, हमने कितना वक्त साथ गुजरा...या ये भी की हमारी यादें कैसी हैं...
यादों का वो पुलिंदा तो तुम्हारे पास छोड़ के आ गई थी...मेरे पास यादें भी तो नहीं है न...इसलिए तो तुम्हें याद नहीं करती हूँ। प्यार क्या बस होना होता है...
जैसे उस लम्हे के बाद कुछ नहीं था, जैसे उस लम्हे के पहले कुछ नहीं था...वो लम्हा isolation में था ...उसका अपना स्वतंत्र वजूद था...वो मेरे और तुम्हारे होने से नहीं बस अपने आप से था। और वो लम्हा आज भी इतना सच्चा है जैसे तुम्हारे खुल के आती हुयी हँसी...जैसे तुम्हारी आंखों का पारदर्शी होना...जैसे की रातों की वो ठंढ...

आज जो तुम हो और आज जो मैं हूँ...हमसे उन लोगो का कोई रिश्ता नहीं था जो जेएनयू की गलियों में कोहरे ढकी सडकों पर हाथ थामे काफी पीते टहलते रहते थे...वो लोग तुम्हें आज भी मिल जायेंगे...

मैं जाती थी उनसे मिलने कभी कभी...बड़ा सुकून सा मिलता था पर अब बड़ी दूर आ गई हूँ, शायद वो मुझे याद करते हों।

कभी तुम जाते हो क्या...कभी मिल आया करो...उन्हें अच्छा लगेगा
और शायद तुम्हें भी...

Wednesday, August 13, 2008

दस्तक...

तुम्हें देखती हूँ सामने
तुम्हारी मुस्कान को छूते ही
पानी की लहरें सी बनती हैं
और खो जाता है झील में नजर आता तुम्हारा अक्स

वैसे ही जैसे बारिशों में
खो जाया करता था मेरा छाता
और भीगते रहते थे हम दोनों

तलाशती हूँ तुम्हें
जैसे घर लौट कर तलाशते थे हम
कि चाभी किसकी जेब में है

पूछना चाहती हूँ तुमसे
वो राहें कैसी हैं
जिन्हें छोड़ के आ गई हूँ
इतनी दूर...

और उन राहों से पूछना चाहती हूँ
कैसे हो तुम...

Tuesday, June 17, 2008

origin of a name

18th sept, 2005

"You know what? Today i was at PSR with a girl who smelt of cloves&cinnamon, whose eyebrows were like black wisps of the night and whose hair was the night itself. Her laughter had hte timbre of ankle bells. The moon was luxuriating in the reflected glory of her visage. It was such a privilege."


and here is the origin of clovesncinnamon, a question people still ask me sometimes ki "यार इन मसालों का क्या चक्कर है? लौंग और दालचीनी ये भी भला कोई नाम हुआ!"

अरसा बीत गया, पर इस नाम की खुशबू अभी भी आती है, और शायद ताउम्र आती रहेगी...क्योंकि ये मेरी खुशबू है, हाँ इस खूबसूरत नाम के लिए शुक्रिया...श्री

Saturday, May 24, 2008

तुमसे कुछ पूछूँ...

क्या तुम्हें भी मिलते हैं?
मेज़ की दराज साफ करते हुए
हँसी के कुछ टुकडे, तस्वीरों में

क्या कभी दो कप चाय कह देते हो
अनजाने में...
और ख़ुद ही पी लेते हो

क्या कभी लगता है
कि मैं फ़िर से लेट हो गई हूँ
आ जाऊँगी थोडी देर में...

क्या तुम अब भी बारिशों में
पकोड़े खाने और कॉफी पीने जाते हो
उनका स्वाद अब भी वैसा ही लगता है?


क्या तुम्हें भी लगता है
कि गलियाँ सवाल करती है
अकेले क्यों आए हो?

इतने सवालों का तो खैर क्या करोगे
बस इतना बता दो...
क्या उस कमरे को
अब भी घर कहते हो?

Monday, April 28, 2008

शायद

शायद
इस जिंदगी में
एक ऐसा दिन भी आएगा

जब हम एक दूसरे के साथ हँस सकेंगे
कुछ पुराने किस्से याद करके मैं तुम्हें चिढ़ा सकूंगी

कुछ पुराने गाने साथ में गा सकेंगे
शायद तुम्हारा सुर तब तक थोड़ा ठीक हो जाए

शायद बहुत सालों बाद कभी अकेले बैठोगे
तो मेरी किसी शरारत पे हँस सकोगे
और हो सकता है मुझे फ़ोन भी कर लो

या शायद ये भी हो सकता है
किसी दिन किसी दोस्त से पता चले
कि मेरा ऊपर से बुलावा आ गया था

और तुम्हें अफ़सोस हो...
यूं ताउम्र रूठे नहीं रहना चाहिए था...

Friday, April 25, 2008

यादें...



दुपट्टे की ओट/ सुबह की धूप

एक प्याली चाय/ इंतज़ार

उसके ना कहने के बाद भी


शब्दों के साथ खेलना

खामोशी महसूस करना

तुम्हारे लिए, तुम्हारे साथ

जीना...


जिंदगी के इन लम्हों के साथ

चोर सिपाही खेलना

थके थके लम्हों को थपकियाँ देकर सुलाना

कतरा कतरा साँझ

किताबों में बंद करना

हरसिंगार की खुशबू

यादों में सहेजना

कविता सी बन जाना

प्यार, शायद

...




याद नहीं आती है तुम्हारी

तुम चली आती हो

हर रात

जब देखता हूँ तुम्हें

तस्वीरों में मुस्कुराते हुए

मेरे पास ही तो रहती हो तुम

नहीं?


तो कमरे का अँधेरा

उजाला सा क्यों लगने लगता है

मेरे पलकों के पास

तुम्हारी मौजूदगी का अहसास क्यों पाता हूँ

इस तरह की मीठी नींद

तुम्हारी थपकियों के बगैर तो नहीं आती
मैं हमेशा मुस्कुराते हुए तो नहीं सोता हूँ

बताओ ना !!!

तुम ही थी कल भी

सिहरन होने पर चादर ओढ़ाने तुम नहीं आई थी !!

बोल दो, एक और झूठ

जैसे कि हमेशा कहती हो...
वो मैं नहीं थी

वो मैं नहीं थी...

यूँ ही

कुछ वक्त का तकाजा कुछ आरजुओं की शरारत

हर राह के आख़िर में अपना घर नज़र आता है

तुम पास से लगते हो जब झुकती हैं पलकें

ख्यालों का ये दीवानापन बेतरहा तडपता है

--:---::---::---::--

कुछ सफ्हे शिकायत करते हैं

तुम्हारे सदियों पहले जाने की

कुछ लम्हे कोशिश करते हैं

तुम्हें याद कर मुस्कुराने की


उन राहों की खामोशियों सी

कुछ गीतों में घुल जाती हूँ

ख़ुद को खोकर जाने कैसे

वो हर लम्हा जी जाती हूँ
--::--::--::--::--

टुकड़े

कहीं कहीं टुकड़ों में
देखती हूँ तुमको...
कभी मुस्कुराते हुए
कहीं खिलखिलाते हुए

जैसे अंजुरी में समेट लेना चाहती हूँ तुम्हें
आँचल में कहीं बाँध लेना चाहती हूँ

जाने किस पगडण्डी के
कौन से मोड़ पर
वो एक लम्हा रुका हुआ है आज भी

जिस लम्हा हमारे रास्ते अलग हो गए थे
जहाँ से मैं कभी लौट नहीं पायी
पर आज भी न जाने क्यों
कभी कभी
लगता है
मुड़ के देखूंगी तो
हम दोनों वही खड़े होंगे

Thursday, August 09, 2007

कि हर ख्वाहिश पे दम निकले

मुझे लौटा दो ना...
वो वन रूम अपार्टमेंट की चाबी
वो लोहे का एक नन्हा सा टुकडा
जिसे मुट्ठी में बाँध गृहस्वामिनी समझती थी खुद को

वो किचन...वो चार दीवारें...वो दीवार से लगे दो बेड
वो कमरे की खिड़की पर पडी चादर

वापस कर दो वो सारे सूर्यास्तों में घुली चाय की चुस्की
वो रात को देर से बाहर खाने के लिए जाना

वो चांदनी रातों में छत पे जाने की जिद करना
वो जाड़े की सुबहों में धूप तापते हुये अखबार पढ़ना

हर शाम तुम्हारे लिए कुछ ना कुछ लाना
और तुम्हारा बच्चों की तरह मचल जाना

वो भुट्टे पे लगी नीबू की खटास
बारिश में एक कप काफ़ी की गर्माहट

नहीं दे सकोगे शायद इतना सारा कुछ

इसलिये अभी के लिए
बस कमरे की चाबी दे दो ना

Monday, June 04, 2007

कोशिश

बारिशों में काफी देर भीगती रही...
शायद हर एहसास को बह जाने देना चाहती थी

एहसास जो भीगे दुपट्टे के छोर से टपकता रहा...
और सड़क के किनारे बहती छोटी छोटी नदियों में मिलता रहा

जमीन से भाप उठ रही थी...बहुत तपी थी मेरे पैरों के नीचे की मिटटी
सारे दिन...धूप में...तेज़ हवाएं भी चली थी

अभी आवारा धूल पानी से मिलकर स्थिर हो गयी थी
वरना तो उसकी फितरत ही नहीं थी कहीं भी ठहरना

सड़कें...धुल कर भी नयी नहीं लग रही थीं
काफी पुरानी लग रही थी...लगभग वैसी ही जैसी ही छोड़कर गयी थी

धुआं धुआं सा सब हो रहा था...धुंधला
और इस धुंध में कुछ भी नहीं तलाश रही थी मैं

पेड सुलग रहे थे, पगडंडियाँ नज़र नहीं आ रही थीं
सब बिखरा बिखरा लग रहा था...मेरी तरह

और मैंने जाना की मैं यहाँ सब छोड़ देना चाहती थी
क्योंकि सब चुभता था...

मैंने जाना...
रिश्ते ख़त्म हो जाते हैं

तो उनमें हमारा कुछ रह जाता है
और वो हमारा कुछ हम चाह कर भी बहा नहीं सकते हैं

वो थोडा सा कुछ कभी वापस नहीं मिलता
और हम अधूरे हो जाते हैं .... हमेशा के लिए

Friday, April 13, 2007

एक रिश्ते के बाद...

सुलगती चिता में धुआँ धुआँ हूँ
दहकती चिता में लपट सी जली हूँ

हर रात सहम जान मौन सवालों से
हर भोर में घबराना धूप के छालों से

मौत मेरा प्रियतम...अब चाहूँ आलिंगन
परित्यक्ता सा जीवन, बोझिल सा हर क्षण

अग्निपरीक्षा में सही कितनी जलन
विश्वास कि बलिवेदी पर रिश्तों का चीरहरण

कितना कुछ हूँ मैं अबूझ पहेली सी
नहीं चाहा अर्पण...नहीं चाहा तर्पण

चाहा बस भटकाव नहीं चाहा बन्धन
काल के निविड़ अन्धकार में अर्थ खोजता मन

आराध्य स्वीकार करो जीवन कि हर स्मृति
कर के खुद को होम् दी आज पूर्ण आहुति


Monday, February 05, 2007

Nadi mein badh aayi hai kahin paani gira hoga
Abhi dil mein dhadkan jinda hai kahin jaljala utha hoga

Saza jeene ki deta ahi mujhe,wo shayad mera khuda hoga
Aaj sawaal ka jawaab bas maun hai,wo jane kya sochta hoga

Khauf khate hain apne khwabon se, socha na tha kabhi aisa hoga
Dard ki sarhadein banate hain,jaane inse aage kya hoga

Kaun jane kya likha hai kismat mein,ab kaun sa tamasha hoga
Kab se nahin huyi hai usse mulakaat,jane wo kis mod pe ruka hoga

Wo kabhi rasta tha kabhi manjil hta, kabhi socha tha wo mera hoga
Aaj main tanha, wo bhi tanha hai, akela apna caravan hoga...

PS: first line courtesy shreejay sinha...i dont know kisne likhi hai...par meri nahin hai, it just sparked off a chain of thoughts.

dard mein bhi ek raahat hai...kam se kam ek stayitva to hai,thahraw ka ek ashwasan to hai...bahte jaana bahte jaana...rukna bas thokar kha kar...jindagi tu bhi alag alag mod pe naye rang le ke bikhar jati hai...

Wednesday, January 25, 2006

aaj ek baar jzara mera haath thaam lo
na jaane kyon lagta hai ki nahin bache hain jyaada din
hamare tumhare saath rehne ke
achanak se lagta hia ke jindagi badi tezi se guzar gayi
aur hum
hum sirf dekhte rahe
jindagi ka guzarna mehsoos karte rahe
sochte rahe ki in lamhon ki trh khushgawar lamhe jindagi mein hamesha rahenge
par aaj, aaj achanak se lagta hai ki waqt kitna kam reh gaya hai
ungliyon pe gin sakte hain maheene
saath saath yun aana, ladna jhagadna
exam mein saara answer dictate karana
aur phir ladna ki isse to accha hum khud hi likh lete
jaade ki dhoop mein laptop le ke presentation banana
chaay peena, chocalate khana
kya yaad aayega tumhein bhi itna hi, jitna ki mujhe
kya tum chaahoge ki in lamhon ka ek hissa tumhara ho
kya tum ye sochoge ki wo saare lamhe jo humne saath bitaye the
maine sahez kar rakhe hain
kya tum ye jaanoge ki woh jo thi
shayad jise jaanne ki koshish nahin ki tumne
wo tumhein khush dekh kar muskura leti thi
tumhein udas dekh kar sade huye pj maar karti thi
lunch isliye tumhare saath karti thi ki tum thaali mein khaana chod na do
bhookhe na uth jaao
tum tum tum aur bas tum
tumhein bataye bina tumhein apni jindagi ki paridhi bhi bana li aur kendra bhi
tum jaan sakoge, nahin na
kyonki
tum kabhi bhi dekh nahin sakoge meri aankhon mein
pyaaar, apnapan, fikr, ya shayad kuch bhi nahin
kyon ki
bheegi aankhon mein aks nazar nahin aate.